बुलंद इमारते जब ढहती है तो कहीं न कही छोटे छोटे खपरैलों में हलचल जरूर होती है। दरअसल पूरी जिंदगी जिसकी ऊंचाई छूने को तरसते रहे एक क्षण में उसका धराशायी होना हलचल नहीं बल्कि बवंडर लाता है.। मामला चाहे धर्म के शिखर पर बैठे गुरु का हो, साहित्य शिरोमणि का हो या मीडिया धुरंधर का हो.। वैसे भी फितरत है यहाँ लोगों कि पहले हीरो बनाओ, महान बनाओ और फिर उसको फॉलो करो।"महाजनो येन गतो सा पन्थः"। और फिर इंतज़ार करो कि कब वो फिसले और उसकी बखिया उधेर दो।
एक और बात है कि बात अगर महिला के सम्मान कि हो तो तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग अचानक से एक्टिव हो जाते हैं जो कि मेरे हिसाब से बहुत अच्छी बात है.। लेकिन गुस्सा तब आता है जब यही प्रबुद्ध वर्ग अपने आसपास हो रहे इस तरह कि घटनाओं से मुह मोड़ लेता है.। नारी सम्मान में ४ पंक्तियाँ लिखना सच में बेहद आसान है। खासकर इन शब्दों के व्यापारी के लिए , लेकिन जब इनके ऑफिस में , घर में या सोसाइटी में कही कुछ हो रहा हो महिलाओं के साथ तो इनकी शब्दों कि कारीगरी और हौसले कही दीखते नहीं हैं.। एक छोटी सी घटना बताता हूँ ।
एक कैब वाला सामने गाडी ड्राइव कर रही लड़की पे जोर से चिल्लाया, दो चार गालियां भी दी.। लड़की कि गलती बस इतनी थी कि वो सिग्नल ग्रीन होने पर गाड़ी निकाल रही थी और कैब वाला रेड लाइट फांद नहीं पाया। वैसे भी रेड लाइट पर जो ड्राईवर गाडी रोक दे उसे नॉएडा में अनाड़ी समझा जाता है.। तो कुल मिलके बात ये थी लड़की ने उसे उसके जन्मसिद्ध अधिकार से रोक दिया था.। कैब वाले ने अपने अथाह गाली ज्ञान का प्रयोग उस नारी पर कर डाला। इसी सब चक्कर गाडी रुक गयी और पूरे १८० सेकंड के लिए.। अब कैब में बैठी मल्टी नेशनल कम्पनीज में काम करने वाली जनता माने कि समाज का एक प्रबुद्ध तबका जो अभी तक तरुण तेजपाल और आसाराम कि निन्दा बड़े जोरो से कर रहे थे। अचानक से सामने हो रही ज्यादती को इग्नोर कर दिया। और तो और कैब वाले के सुर में सुर मिलते हुए बोलने लगे- इन लड़कियों को तो लाइसेंस मिलना ही नहीं चाहिए ड्राइविंग का, अरे पी के चला रही होगी , कपडे नहीं देखे कैसे पहने थे उसने , दो चार गालियाँ … , खामखा ३ मिनट लेट करवा दिया,। पीछे से एक मरियल सा इंसान बोला - " अरे भाई लड़की को ऐसे गाली मत दो."। तो तपाक से तीन चार बंधु कैब वाले कि तरफ से चढ़ गये उस बेचारे पर।
ये तो बहुत छोटा सा उदहारण है लेकिन कहीं न कहीं हर जगह स्थिति ऐसी ही है। तो भैया सीधी सी बात ये है कि जब तक हर पुरुष ये सोच न ले कि कम से कम अपनी आँखों के सामने किसी महिला के साथ अत्याचार नहीं होने देगा तब तक उन्हें आसाराम या तेजपाल या रामपाल -श्यामपाल जैसे किसी पर भी बोलने का अधिकार नहीं है.।